कबूतर जा, जा, जा
कबूतर जा जा जा
पहले प्यार
की पहली चिट्ठी साजन को दे आ
कबूतर जा, जा, जा ...
उनसे कहना, जब
से गये तुम, मैं तो अधूरी लगती हूँ
इन होंठों पे
चुप सी लगी न रोती न हँसती हूँ
भूल हुई जो
उन्हें सताया, कैसा पाप किया
कबूतर जा, जा, जा ...
मन ही मन में
उनको अपना सब कुछ मान चुकी हूँ मैं
वो क्या हैं, मैं
कौन हूं उनकी, अब ये जान चुकी हूँ मैं
उनको अपने
साथ ही लाना, दिल ही नहीं
लगता
कबूतर जा, जा, जा ...
यहाँ का मौसम
बड़ा हसीं है, फिर भी प्यार उदास है
उनसे कहना, दूर
सही मैं दिल तो उन्हीं के पास है
तू ये संदेशा
उनकोओ सुनाना, मैं पीछे आया
कबूतर जा, जा, जा ...
जहाँ भी
देखूँ तुम ही तुम हो, और नज़र न कुछ आये
दिल ये चाहे
इस आलम में काश ज़माना रुक जाये
आज से पहले
कभी नहीं थी इतनी हसीं दुनिया
कबूतर जा, जा, जा ...
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