ल: आऽ
हुस्न
पहाड़ों का
ओ
सायबा हुस्न पहाड़ों का
क्या
कहना के बारहों महीने यहाँ मौसम जाड़ों का
सु: रुत ये सुहानी है
मेरी
जाँ रुत ये सुहानी है
के
सर्दी से डर कैसा संग गर्म जवानी है \-२
ओ
होऽ
ल: ओऽ
तुम
परदेसी किधर से आये
आते
ही मेरे मन में समाये
करूँ
क्या हाथों से मन निकला जाये \-२
सु: छोटे\-छोटे
झरने हैं
के
झरनों का पानी छू के कुछ वादे करने हैं
ल: झरने तो बहते हैं
क़सम
ले पहाड़ों की जो कायम रहते हैं
दो: humming
सु: खिले\-खिले
फूलों से भरी\-भरी वादी
रात
ही रात में किसने सजा दी
लगता
है जैसे यहाँ अपनी हो शादी \-२
ल: क्या गुल बूटे हैं
पहाड़ों
में ये कहते हैं परदेसी तो झूठे हैं
सु: हो
हाथ
हैं हाथों में
ल: के रस्ता कट ही गया इन प्यार की बातों में
दो: दुनिया ये गाती है
सुनो
जी दुनिया ये गाती है
कि
प्यार से रस्ता तो क्या ज़िंदगी कट जाती है \-२
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